आज फ़िर
कि आज फ़िर
तुम्हारा ज़िक्र हुआ
थे आये कुछ शागिर्द
अपने सवालात लेकर
उलझन थी कुछ उनकी
उनके हालात को लेकर
हम भी ऐ ख़ुदा
उन्हें तालीम देने लगे
लगा उन्हें कुछ ऐसा की मानो
उनकी हर एक उलझनों को
हम दूर करने लगे
कुछ ही पल में वो समझ बैठे
कि हम उनके दिल की बात करने लगे
हम उनके एहसास समझने लगे
हमारे खयालात मिलने लगे
कि जिस रस्ते गुजर रहे हैं
वो आजकल
उस रस्ते का वो हमें
उस्ताद समझने लगे...
ख़ैर
ख़ता थोड़ी थी उनकी कोई
कि एक नाक़ाम आशिक़ के बीते कल में
वो खुद का आज देखने लगे
बातों बातों में न जाने
ये सिलसिला कहाँ जा पहुँचा
कि वो हमसे
हमारे दिल-ऐ-ख़ास के ज़िक्र की
गुज़ारिश करने लगे
उनकी गुज़ारिश का सलीक़ा
भी इतना मासूम था
की हम ना-क़ुबूल न कर सके..
वो तुम्हारे ज़िक्र को इनक़ार
मुझसे हो न पाया
ज़ेहन में उतर चुका था
जो चेहरा तुम्हारा
मैं उसे नज़र अंदाज़ न कर पाया
हुआ शुरू ये सिलसिला
मेरी उन कविताओं से
जो लिख रक्खीं थीं
मैंने तुम्हारे लिये उन दिनो
कहने को तुमसे
पर आज तक क़भी
कह न पाया
वो चंद लफ़्ज़ ही तो थे
समेटे जो मेरे एहसास को
शायद कुछ ही मगर
करते ज़िक्र मेरे हाल-ए-दिल का
मेरे यार को
पर उन्हें ज़ाहिर करने की
हिम्मत भी कभी न कर पाया
मेरा इज़हार
पर तुम्हारा इनक़ार या इक़रार
इक़रार या इनक़ार
फ़सा रह गया
मैं इस गफलत में
और कभी कुछ न कह पाया..
आज भी वो यादें
कभी
वो तुम्हारा यूँ ही मिल जाना
कभी
मेरे इंतेज़ार करने पर भी न मिलना
तुम्हारी इक झलक की दवा
मुझे आज भी याद है
लगे ऐसा जैसे ये सब
कल की ही बात है..
मेरे दिल की बात है
मेरी रूह के पास है
तुम्हारा ज़िक्र आज भी
उतना ही ख़ास है
आज भी उतना ही ख़ास है..!
चलो ओ यादों
छोड़ो मुझे मेरे हाल पर
ध्यान दूँ मैं अपने काम पर
कम्बख़त
शागिर्दों ने भी क्या ख़ूब कर दिया
तुमसे जुड़े
मेरे खुद के बुने
मेरे कल को
बेनक़ाब कर दिया
जाते जाते कह गए
की उस्ताद ग़लती न खुदा की
पर आपकी ही है.
भला इतने ख़ूब ख़याल
लिखकर भी
आपने इन्हें उनसे
क्यों छिपा दिया
क्यों छिपा दिया.
बढ़िया ....
ReplyDeleteबहुब ही सुंदर रचना है।
DeleteNice. Keep going.
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