संभावनाए
है खिल गया जो पुष्प
उसे तोड़ना निषेध है
क्या निषेध भी वो जीवन
जिसमें न कोई क्लेश है...??
है क्लेश वह या है कमी
कमी कभी जो मैंने की
परिश्रम के तौल माप में
प्रयास में या आस में
या फिर औरों के कयास में
थी जहाँ भी
माना मैंने की...!!
माना लहरें वो असामान्य थीं
पर पतवार मेरे हाथ थी
मेरी बुद्धि मेरे साथ थी
थे साथ साथी पूरे
पर
क्या बल में कमी थी रह गयी
पानी रहते नाव झुलस गयी
मचल रही थीं लपटें
मेरी नौका जल में जल गयी...!!
सम्पूर्ण भाव से स्वीकार है
प्रकृति के लिए आभार है
हृदय की बस यही पुकार है
न हो निराश
तू भूल मत
"संभावनाए"
आज भी अपार हैं
आज भी अपार हैं..!!
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