झकझोर
हैं झकझोर जातीं मुझको
बातें जो न आतीं अक्सर
मन में मेरे, ज़हन में मेरे
आतीं तब ही जब मैं देखूँ
कि
गरीब, हाथ है पसारे
लाचार, भूख के हैं मारे
युवा जो हैं भरे यहाँ पे
वो सिर्फ रोजगार को निहारे
न चमकते इनके तारे
ये भगवान् के सहारे
ये जी रहे या ढो रहे
जीवन जो कठिन है इनका
ये सह रहे न कुछ कह रहे
अंतहीन दर्द है जो इनका
न गूँजती न सूझती
हो चीख़ या हो इसका हल
क्या फिक्र सच में है किसी को
आने वाला जो है अँधेरा कल
न रूकती तब भी चलती
है जैसी भी ये ज़िन्दगी
हसीन है ये ज़िन्दगी..
कहते हैं देती मौका
आता है जब वक़्त इसका
देर से सबेर से
पर देती ये जरूर मौका
बस कर सबर तू इसका..
बस कर सबर तू इसका..।।
Situation ke hisab se jo mara tumne patthar.
ReplyDeleteHone ko wo bhi ho jata hai,jo hota nhi aksar
सुंदर कविता...समाज के हालत को दिखाती हुई...सम्भावनाओं पर भी आपने जोड़ा है ।
ReplyDeleteबधाई आपको 💐💐
Ji Haan Dhruv Ji..!
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